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मुद्रा २०१२ - १३

फसलों की खेती की विधियां

खरीफ फसल - मूंगफली

मूंगफली की कृषि कार्यमाला

  भूमि का चुनाव एवं तैयारी -  

पानी का अच्छा निकास, हल्की से मध्यम रेतीली कछारी या दोमट भूमि उपयुक्त है। तीन साल के अंतराल में एक बार गहरी जुताई करें इसके बाद दो बार देशी हल या कल्टीवेटर चलायें एवं बखर चलाकर पाटा लगाना चाहिये।
बीज दर: 40-48 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बोनी करें।

उन्नत जातियाँ:

किस्म

पकने की अवधि

फलियां कि.ग्रा./एकड़

तेल प्रतिशत

अन्य विवरण

फुलो प्रगति (जे.एल.-24)

100-115

17

50.8

अंगेती उन्नत जाति है तथा पूरे देश में इसे सफलतापूर्र्वक लगाया जा रहा है। इसे ग्रीष्म ऋतु में नहीं लगाना चाहिये।

जी.जी 3

95-105

12-13

51

यह किस्म खरीफ एवं ग्रीष्म के लिये उपयुक्त है। यह कालर राट रोग रोधी किस्म है।

टी.जी. 26

105-120

6-8

48

इसको खरीफ एवं ग्रीष्म काल दोनों में लगाया जा सकता है। 3-4 दाने वाली लम्बी फली

ज्योति

105-110

6-8

53.3

इसमें रुट राट जड़सड़न का प्रभाव कम पाया गया है। दोनों ही मौसम में उगाया जा सकता है।

जे.जी.एन -3

100-105

6-8

50

खरीफ मौसम के लिये अनुशंसित।

 

बीजोपचार: 

3 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। पौधों के सूखने की समस्या वाले क्षेत्र में 2 ग्राम थीरम # 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम बीज मिलाकर उपचारित करें या जैविक उपचार ट्रायकोडर्मा 4 ग्राम चूर्ण प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपयोग करें। इसके पश्चात् 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के मान से रायजोबियम कल्चर से भी उपचार करें।

बोनी का समय एवं तरीका: 

वर्षा प्रारम्भ होने पर जून के मध्य से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बोनी करना चाहिये। कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 8-10 से.मी. रखना चाहिये। बीज 4-6 से.मी. गहराई पर बोयें। बोनी कतारों में सरता, दुफन या तिफन से करना चाहिये।

खाद एवं उर्वरक: 

भूमि की तैयारी के समय गोबर की खाद 2-4 टन प्रति एकड़ प्रयोग करें। उर्वरक के रुप में 8 किलोग्राम नत्रजन, 16-32 किलोग्राम स्फुर एवं 8 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ देना चाहिये। यदि खेत में गोबर की खाद तथा पी.एस.बी. का प्रयोग किया जाता है तो स्फुर की मात्रा 32 किलोग्राम प्रति एकड़ की जगह मात्र 16 किलोग्राम ही पर्याप्त है। खाद की पूरी मात्रा आधार खाद के रुप में प्रयोग करें। मँगफली फसल में गंधक का विशेष महत्व है। इसलिये 10 किलोग्राम प्रति एकड़ के मान से गंधक अवश्य दिया जाना चाहिये। यदि यूरिया की जगह अमोनिया सल्फेट तथा फास्फेट के रुप में सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग किया जाता है तो गंधकक पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। अन्यथा 80 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर जिप्सम या पाइराइट्स का उपयोग आखिरी बखरनी के साथ करें। साथ ही 10 किलोग्राम प्रति एकड़ के मान से तीन साल के अंतर पर जिंक सल्फेट का प्रयोग अवश्य करें।

फसल चक्र:

फसल चक्र: मूंगफली (खरीफ) - गेहॅं(रबी), मूंगफली (खरीफ) - मक्का (खरीफ), मूंगफली (खरीफ)-चना (रबी), मूंगफली ग्रीष्म- कपास (खरीफ), मूंगफली ग्रीष्म - मक्का/ज्वार/कपास

अंतरवर्तीय फसलें:

अंतरवर्तीय फसल के रुप में मक्का, ज्वार, सोयाबीन, मूंग, उड़द, तुअर, सूर्यमुखी आदि फसलों को 4:2, 2:1, 8:2, 3:1, 6:3, 9:3 अनुपात में आवश्यकतानुसार लिया जा सकता है।

सिंचाई :

सिंचाई की सुविधा होने पर अवर्षा से उत्पन्न सूखे की अवस्था में पहला पानी 50-55 दिन में तथा दूसरा पानी 70-75 दिन में दिया जाना चाहिये।

निंदाई- गुड़ाई :

फसल बोने के 15-20, 25-30 तथा 40-45 दिन की अवस्था में डोरा या कोल्पा चलावें, जिससे समय-समय पर नींदा नियंत्रण किया जा सके। नींदानाशक दवाओ के उपयोग से भी नींदा नियंत्रण किया जा सकता है।

खरपतवारनाशी रसायनों की मात्रा एवं प्रयोग विधि:
 

खरपतवारनाशी

मात्रा सक्रिय तत्व मि.ली./एकड़

उपयोग विधि/समय

{Éäb÷Ò‡¨ÉlÉ䇱ÉxÉ  

300-400

बुवाई के बाद परंतु फसल तथा खरपतवारों के उगने से पूर्व

फ्लुक्लोरेलीन

300-400

बुवाई से पूर्व जमीन में 4-5 से.मी. गहराई तक मिलना चाहिये।

एलाक्लोर 

400-600

बुवाई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व।

पौध संरक्षण:

अ. कीड़े - बोडला कीट (व्हाइट ग्रब) 

  1. मई-जून के महीने मे खेत की दो बार जुताई करना चाहिये।

  2.  अगेती बुवाई 10-20 जून के बीच करना चाहिये।

  3. मिट्टी में फोरेट 10जी या कार्बोफ्यूरॉन 3जी 10 किलोग्राम प्रति एकड़ डालना चाहिये।

  4. बीज को फफूंूदनाशक उपचार से पहले क्लोरपायरीफास 12.5 मि.ली. प्रति किलोग्राम बीज को उपचार कर छाया में सूखाकर बोनी करना चाहिये।

कामलिया कीट : मिथाइल पेरामिथान 2 प्रतिशत चूर्ण का 10 -12 किलोग्राम प्रति एकड़ प्रारम्भिक अवस्था में भुरकाव या पैराथियान 50 ईसी का 280-300 मि.ली. प्रति एकड़ के मान से छिड़काव करें।

महों, थ्रिप्स एवं सफेद मक्खी : इनके नियंत्रण के लिये मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. का 220 मि.ली. प्रति एकड़ या डाईमिथिएट का 30 ई.सी. का 200 मि.ली. प्रति एकड़ 200 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रयोग करें।

सुरंग कीट: सुरंग कीट: क्यूनालफास 25 ई.सी. का 400 मि.ली., या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 240 मि.ली. प्रति एकड़ का छिड़काव करें।

चूहा एवं गिलहरी : यह भी मूंगफली को नुकसान करते हैं, अत: इनके नियंत्रण पर ध्यान दें।

ब. रोग :

टिक्का#पर्ण धब्बा : बोने के 4-5 सप्ताह से प्रारम्भ कर 2-3 के अंतर से दो-तीन बार कार्बेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत या डायथेन एम-45 का 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिये।
कालर सड़न/शुष्क जड़ सड़न : बीज को 5 ग्राम थायरम अथवा 3 ग्राम डाइथेन एम-45 या 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज दर से उपचार करना चाहिये।
 

फसल कटाई :

जैसे ही फसल पीली पड़ने लगे तथा प्रति पौधा 70-80 प्रतिशत फली पक जावें उस समय पौधों को उखाड़ लेना चाहिये। फलियों को धूप में इतना सुखाना चाहिये कि नमी 8-10 प्रतिशत रह जाये, तभी बोरों में रखकर भण्डारण नमी रहित जगह पर करें। बोरियां रखने के बाद उन पर मेलाथियान दवा का छिड़काव करना चाहिये।

उपज: समयानुकूल पर्याप्त वर्षा होने पर खरीफ में मूंगफली की उपज लगभग 6-8 क्विंटल प्रति एकड़ तक़ ली जा सकती है।


M.P. Krishi
 
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