फसलों की खेती की विधियां
खरीफ फसल - कोदों-कुटक
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कोदों-कुटकी की कृषि कार्यमाला |
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भूमि
का चुनाव एवं तैयारी -
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इसकी
खेती के लिये दोमट एवं हल्की दोमट भूमि उपयुक्त है । खेती के लिये
वे ही खेत चुनने चाहिये जो ऊँचे हो, वर्षा का पानी रूकने वाले खेतों
में बोनी नहीं की जाती है । प्राय: कम उपजाऊ, पहाड़ी या पठारी,
कंकरीली जमीन में इन फसलों का अधिक प्रचलन है। भूमि को एक बार
मिट्टी पलटने वाले हल एवं 2-3 बार देशी हल से जुताई के बाद खेत में
पाटा चलाकर ढेलों को तोड़ देना चाहिये एवं खेत को समतल कर देना
चाहिये ।
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जातियाँ : |
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प्रदेश में निम्नलिखित उन्नत किस्मों का अनुशंसित किया गया है।
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क्रमांक
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किस्म |
पकने की अवधि |
बालियों की लम्बाई |
पैदावार क्विं./एकड़ (दाने) |
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(अ) उन्न्तशील जातियाँ
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1 |
निवास नं-1
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115 दिन
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9.5 से.मी.
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6-7.20 क्विं.
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2 |
डिंडोरी-73
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112 दिन
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7.4 से.मी.
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6-8 क्वि.
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3 |
पाभी
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112 दिन
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7.7 से.मी.
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7.20-8 क्विं.
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(ब) अन्य उन्नत किस्में
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1 |
पी.एस.सी.-1,
2आर.पी.एस.-41, 76पी.एल.आर.-1जे.एन.के.-364
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110-105 दिन
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9.5 से.मी.
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7.20-8 क्विं.
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2 |
जे.के.-41, जे.के.-62,
जे.के.-76 |
85 दिन
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7.7 से.मी.
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6-7.20 क्विं.
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इनके
अलावा कोदों व कुटकी की कई उन्नतशील किस्मों का विकास जवाहर लाल
नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के डिण्डोरी एवं रीवा अनुसंधान केन्द्रों
द्वारा किया गया है । ये किस्में ''जवाहर'' नाम से ही प्रचलित हैं
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जलवायु:
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50
से 75 से.मी. वर्षा वाले क्षेत्र में इसकी खेती की जाती है । उष्ण
एवं समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्र में इसकी खेती सुगमता से की जा
सकती है। मध्यप्रदेश में मण्डला, डिण्डोरी, उमरिया, छिन्दवाड़ा, सीधी,
रीवा, बालाघाट, बैतूल, कटनी, जबलपुर आदि जिलों में यह एक प्रचलित
फसल है ।
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बीज की मात्रा :
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6-8 किलो प्रति एकड़
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बोने की विधि :
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कोदो को छिडककर या बिखेर कर बोनी की जाती है, इसमें पौधों के बीच
की दूरी बराबर नहीं होती है । बीज को 25-30 से.मी. की दूरी पर बनी
पंक्तियों या सीडड्रिल द्वारा बोना चाहिये । पौधों के बीच का अन्तर
8-10 से.मी. होना चाहिये एवं बीज के दानों की गहराई लगभग 2-3 से.मी.।
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फसल चक्र:
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कोदो
की फसल के पश्चात रबी में जौ, मसूर, चना, अलसी व सरसों आदि फसल उगा
सकते हैं । इसे अरहर, ज्वार, मक्का, धान के ऊपरी खेती में सांवा के
साथ मिश्रित रूप से उगा सकते हैं । हल्की भूमि में तिल व अरहर के
साथ व भारी भूमियों में अरहर, कोदो, उड़द, ज्वार आदि के साथ उगा सकते
हैं ।
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खाद एवं
उर्वरक:
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कोदो को प्रति हेक्टर 16 किलो नाईट्रोजन 12 किलो फास्फोरस एवं 8
किलो पोटाश प्रति एकड़ की आवश्यकता होती है बुवाई के पहले खेत में
छिड़काव कर उर्वरक मिला देना चाहिये । जैविक खाद को बुआई से 20-25
दिन पहले छिड़ककर अच्छी तरह खेत में मिला देना चाहिये ।
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सिंचाई एवं
निंदाई गुड़ाई: |
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कोदो
वर्षा ऋतु में बोई जाती है । यदि पानी बरसने में विलम्ब हो तो एक
सिंचाई देना चाहिये । 2-3 बार निदांई गुड़ाई करना आवश्यक है ताकि
खरपतवार नष्ट हो जावे एवं पौधों का उचित विकास हो सके ।
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कीट एवं
बीमारियाँ :
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कीट बिहार रूएंदार सुंडी : पत्तियों को हानि पहुंचाती है। कभी-कभी
तने पर भी आक्रमण करती है । उपचार हेतु थायोडान 35 ई.सी. घोल के
0.15% घोल को 250-300 लीटर पानी प्रति एकड़ छिड़काव करें ।
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ग्रास
हापर (टिड्डा) : पत्तियों को हानि पहुँचाता है । बचाव हेतु
पेराथियान 2ऽ चूर्ण को 10 किलो प्रति एकड़ प्रयोग करें ।
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तनाछेदक
या तना मक्खी : इसके नियंत्रण के लिये थीमेट 10 जी दानेदार 6 किलो
प्रति एकड़ का उपयोग करें ।
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सफेद ग्रब : पेराथियान 2ऽ चूर्ण 6 किलो प्रति एकड़ गोबर में मिलाकर
खेत में बराबर बखेर दें ।
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बीमारी :कंडुआ
रोग :
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इसमें
पूरी बाली काले चूर्ण जैसे पदार्थ से ढ़क जाती है । रोग ग्रस्त पौधा
अन्य पौधों से ऊँचा होता है । इसकी रोकथाम हेतु बीजों को बोनी पूर्व
गर्म पानी से उपचारित करें । बीजों को 5 डिग्री से.ग्रे. तापमान में
7-10 मिनिट रखना चाहिये एवं बोने के पहले एग्रोसान जी.एन. फफूंदनाशक दवा
से उपचार करें
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कटाई मड़ाई : |
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फसल
90-140 दिन में सितम्बर - नवम्बर तक पककर तैयार हो जाती है। या तो केवल
बालियों को काटकर सुखाकर तथा कूटकर दाना अलग कर लिया जाता है या फिर
पूरा पौधा ही काटकर, सुखाकर और बेलों द्वारा मड़ाई करके दाना निकाला जाता
है। |
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उपज : |
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दाना 4-6 क्विंटल
प्रति एकड़
भूसा 8-10 क्विंटल प्रति एकड़
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