राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि
विश्वविद्यालय, ग्वालियर
राजमाता
विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर
राजमाता विजयाराजे सिंधिया
कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर की स्थापना दिनांक 19 अगस्त,
2008 को हुई है। विश्वविद्यालय में संस्था प्रमुख कुलपति के पद
के अतिरिक्त कार्य संपादन के लिये कुलसचिव, लेखानियंत्रक,
अधिष्ठाता कृषि संकाय, संचालक अनुसंधान विस्तार, शिक्षण एवं
अन्य पद को तालिका-1 में अंकित है, म.प्र. शासन द्वारा स्वीकृत
किये गये है । स्वीकृत पदों में कुलपति के अलावा लेखानियंत्रक
का पद भरा हुआ है । शेष पदों को भरे जाने की प्रक्रिया प्रचलन
में है। प्रदेश के महाविद्यालय एवं क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र,
आंचलिक अनुसंधान केन्द्र एवं कृषि विज्ञान केन्द्र, जो इस
विश्वविद्यालय के अंतर्गत् कृषि जलवायु क्षेत्र में संचालित
है, कृषि शिक्षा अनुसंधान एवं विस्तार का कार्य संपादित कर रहे
है विश्वविद्यालय के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत 04 कृषि
महाविद्यालय, 01 उद्यानिकी महाविद्यालय, मंदसौर, 05 आंचलिक कृषि
अनुसंधान केन्द्र, 04 क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र, 01 कृषि
अनुसंधान केन्द्र, बागवई, ग्वालियर, 01 फल अनुसंधान केन्द्र,
ईंटखेड़ी, भोपाल, 01 उद्यानिकी अनुसंधान केन्द्र, जॉवरा (रतलाम),
01 लवणीय प्रभावित मृदा कृषि अनुसंधान केन्द्र, बड़वाह, खरगोन
एवं 19 कृषि विज्ञान केन्द्र जो प्रदेश के 25 जिलों में
विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में कार्यरत् है ।
तालिका 1: राजमाता विजयाराजे सिंधिया
कृषि विश्वविद्यालय हेतु नवीन स्वीकृत प्रशासनिक एवं कृषि संकाय के
पद
क्र.
पदनाम
स्वीकृत
भरे
रिक्त
1
कुलपति
1
1
-
2
कुलसचिव
1
-
1
3
लेखानियंत्रक
1
1
-
4
अधिष्ठाता कृषि
संकाय
1
1
-
5
संचालक,
शिक्षण एवं छात्र कल्याण
1
1
-
6
संचालक
अनुसंधान सेवायें
1
1
-
7
संचालक
विस्तार सेवायें
1
1
-
8
प्राध्यापक एवं
विभागाध्यक्ष
12
3
9
9
वरिष्ठ
वैज्ञानिक एवं केन्द्र प्रभारी
1
-
1
10
सूचना एवं जन
सम्पर्क अधिकारी
1
-
1
11
कार्र्यपालन
यंत्री (सिविल)
1
-
1
12
संयुक्त
संचालक विस्तार
1
-
1
13
विश्वविद्यालय
ग्रंथपाल
1
-
1
14
सह संचालक
अनुसंधान (अनु., बीज उत्पादन एवं प्रक्षेत्र विकास)
2
1
1
15
सहप्राध्यापक
(तकनीकी अधिकारी)
1
-
1
16
उप संचालक
विस्तार (सी.एस. एवं पी.पी.)
2
1
1
17
उप संचालक (छात्र
कल्याण/सांस्कृतिक एवं क्रीडा)
2
-
2
18
उप संचालक
अनुसंधान (कृषि, पशु वि., कृषि अ)
3
1
2
19
उप कुलसचिव (स्था./शिक्षण)
2
-
-
20
उप
लेखानियंत्रक
1
-
-
21
तकनीकि अधिकारी
(DRS)
1
-
1
22
तकनीकि अधिकारी
(संचालक प्रसार सेवाएें)
1
1
-
23
विषय वस्तु
विशेषज्ञ
7
6
1
24
सहायक कुलसचिव
(स्था./शिक्षण/सामान्य/विधि)
4
-
4
25
सहायक
लेखानियंत्रक
3
-
3
26
सहायक लेखा
अधिकारी
1
-
1
27
निज सचिव
7
2
5
28
कनिष्ठ शीघ्र
लेखक (हिन्दी/अग्रेंजी)
24
-
24
29
अनुभाग
अधिकारी
10
-
10
30
सहायक
ग्रंथपाल
2
2
-
31
तकनीकी सहायक
ग्रंथपाल
2
-
2
32
तकनीकि सहायक
(IPRO)
2
-
2
33
सहायक यंत्री
(1 इलेक्ट्रीकल+2 सिविल)
3
-
3
34
उप यंत्री (2
इलेक्ट्रीकल+8 सिविल)
10
2
8
35
सहायक
श्रेणी-1
11
-
11
36
सहायक
श्रेणी-2
16
4
12
37
सहायक
श्रेणी-3
53
7
46
38
स्टोर कीपर (केन्द्र+विक्रय
केन्द्र)
2
-
2
39
कम्प्यूटर
प्रोग्रामर
1
1
-
40
कम्पयूटर
आपरेटर
4
-
4
41
रेडियो
अधिकारी
1
-
1
42
सेनेटरी
इंस्पेक्टर
1
-
1
43
इलेक्ट्रीशियन
1
-
1
44
फोटोग्राफर
1
-
1
45
मानचित्रकार
1
-
1
46
सुपरवाईजर (मुद्रण
प्रोद्योगिकी)
1
-
1
47
प्रूफ रीडर (Journalist
Dipl.)
1
-
1
48
आफसेट मशीन
आपरेटर
1
-
1
49
वाइन्डर
1
-
1
50
प्लम्बर
1
-
1
51
कारपेन्टर
1
-
1
52
मेसन
2
-
2
53
पम्प
अटैन्डेन्ट
2
-
2
54
वाहन चालक
18
-
18
55
भृत्य/चौकीदार
46
-
46
56
ग्रंथपाल
परिचारक/भृत्य
2
-
2
57
लायब्रेरी
सार्टर
1
-
1
58
ग्राउण्ड मेन
1
-
1
59
हेल्पर
2
-
2
60
क्लीनर
1
-
1
योग:-
287
39
248
वर्ष 2011-12 से विश्वविद्यालय द्वारा कृषि संकाय के अंतर्गत 07 एवं
उद्यानिकी के अंतर्गत 04 विषयों में स्नातकोत्तर कार्यक्रम चलाये
जा रहे हैं। साथ ही नौ विषयों में पी.एच.डी. कार्यक्रम भी चलाये जा
रहे हैं।
1. शैक्षणिक गतिविधियां
(+) कृषि एवं उद्यानिकी
विश्वविद्यालय के वर्ष 2008 के
स्थापना से ही शिक्षण कार्य निरंतर प्रगति पर अग्रेषित है। इस
विश्वविद्यालय द्वारा कृषि तथा उद्यानिकी में स्नातक, एवं
स्नातकोत्तर एवं पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्रदान करने का प्रावधान
है।
वर्तमान में विश्वविद्यालय के अंतर्गत कृषि
संकाय कार्यरत है। इस संकाय में अलग-अलग विभाग है। प्रत्येक विभाग के
प्रमुख विभागाध्यक्ष होते है। कृषि संकाय में 12 विभाग है। कृषि संकाय के
अंतर्गत 4 कृषि महाविद्यालय (ग्वालियर, सीहोर, इन्दोर, तथा खंडवा) एवं 1
उद्यानिकी महाविद्यालय (मंदसौर) विद्यमान है।
वर्तमान में विश्वविद्यालय के
अंतर्गत कृषि संकाय कार्यरत है। इस संकाय में अलग-अलग विभाग
है। प्रत्येक विभाग के प्रमुख विभागाध्यक्ष होते है। कृषि
संकाय में 12 विभाग है। कृषि संकाय के अंतर्गत 4 कृषि
महाविद्यालय (ग्वालियर, सीहोर, इन्दोर, तथा खंडवा) एवं 1
उद्यानिकी महाविद्यालय (मंदसौर) विद्यमान है।
अन्य गतिविधियां प्लेसमेंट
विश्वविद्यालय में स्थापित
प्लेसमेंट सेल के माध्यम से 243 विद्यार्थियों का चयन हुआ। विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के
वैज्ञानिकों का व्याख्यान विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिकों ने
विश्वविद्यालय में समय-समय पर भ्रमण किया तथा महत्वपूर्ण
व्याख्यान दिये।
अनुसंधान
अनुसंधान, राजमाता विजयाराजे सिंधिया
कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर का एक प्रमुख कार्य है इसलिए
निदेशालय अनुसंधान सेवाएं की स्थापना इस विश्वविद्यालय में
चल रही विभिन्न परियोजनाओं के समन्वयन हेतु, बीज/फसल किस्मों
के पहचान हेतु, नई परियोजनाओं द्वारा कृषकों एवं कृषि से
जुडे आमजन को लाभान्वित करने हेतु व विभिन्न प्रशिक्षण
कार्यक्रम, संगोष्ठी द्वारा नई तकनीकी व सूचनाओं का प्रसार
करने हेतु की गई है। इस निदेशालय के अंर्तगत निम्न केन्द्र
कार्यरत्त है -
आंचलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र (5) मुरैना, खरगोन, झाबुआ, सीहोर,
इन्दौर क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र (4) उज्जैन, ग्वालियर, मन्दसौर खण्डवा
कृषि/उद्यानिकी अनुसंधान केन्द्र (6)
फल अनुसंधान केन्द्र, ईटखेड़ी (भोपाल),
उद्यानिकी अनुसंधान केन्द्र, जावरा (रतलाम) कृषि अनुसंधान प्रक्षेत्र, बागवई
(ग्वालियर), कृषि अनुसंधान केन्द्र, बड़वाह (खरगोन)
तिल अनुसंधान केन्द्र, भिण्ड़,
बीज प्रगुणन प्रक्षेत्र, सिरसौद
बाह्य वित्तीय स्रोतों से
स्वीकृत तदर्थ (एडहॉक) अनुसंधान परियोजनाएं
विश्वविद्यालय को इस वर्ष बाह्य वित्तीय
स्रोतों से 978.53 लाख रुपये की अनुसंधान परियोजनाएं स्वीकृत
हुई। जिनमें कृषि अर्थव्यवस्था की निगरानी हेतु संकाय,
मध्यप्रदेश में डबल डॉलर चने के प्रतिस्थापन हेतु तकनीकी का
वैधीकरण, तिल की स्थानीय प्रजातियों का संग्रहण, मूल्यांकन,
संरक्षण एवं उपयोग, अरहर की नई संकर प्रजातियों के बेहतर कृषि
आधार हेतु कोशिकीय द्रव्य नरबंध्य पंक्ति का विकास एवं
स्थानांतरण, जागरुकता सह निगरानी कार्यक्रम पर अग्रणी परियोजना,
चारा विकास कार्यक्रम, प्रक्षेत्र पर अनुसंधान एवं बीज उत्पादन
हेतु अद्योसंरचना का विकास एवं नवीनीकरण, मध्य भारत की उच्च
क्षरणीय बीहड़ों में जलवायु सहनषील कृषि हेतु प्रभावी एकीकृत
घटकों की पहचान एवं कार्बन का अधिग्रहण आदि प्रमुख है ।
परामर्श प्रक्रिया प्रकोष्ठ
बाहय वित्त पोषित अनुसंधान
परियोजनाओं के अतिरिक्त विश्वविद्यालय को इस वर्ष परामर्श
प्रक्रिया प्रकोष्ठ द्वारा गेंहू, सोयाबीन, कपास, अफीम, चना,
सरसों, टमाटर, मिर्च, अंगूर, केला एवं मूंगफली आदि फसलों पर
परीक्षण अनुसंधान के लिये 44 कम्पनियों से रू. 170.50 लाख की
राशि प्राप्त हुई।
नवीन विकसित तकनीक i. जनन द्रव्यों का पंजीकरण
विश्वविद्यालय द्वारा विकसित
10 फसलों की 15 प्रजातियों का पंजीकरण राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक
संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली में कराया गया। जहां से प्रत्येक
जननद्रव्य को राष्ट्रीय पहचान संख्या प्रदान की गई। जो
निम्नानुसार है -
Crop
Varieties
National Identity
Pigonpea
Parents of CMS based
hybrid RVICPH 2671
IC587378
RVA 28
IC587379
Chickpea
RVKG 101
IC587380
RVSJKG 102
IC587381
RVG 201
IC587382
RVC 202
IC590133
RVS 203
IC590134
Soybean
RVS 2001-04
IC587383
Wheat
RVW 4106
IC587060
Safflower
RVS 113
IC587061
Lentil
RVL 31
IC587062
Safed musli
RVSM 414
IC587063
Ashwagandha
RVA 100
IC587064
Kalmegh
RVK 1
IC587065
Sarpgandha
RVSP 1
IC587066
ii
किस्मों
की अधिसूचना
विभिन्न फसलों की उपरोक्त किस्में, जो
मध्यप्रदेश किस्म विमोचन समिति द्वारा दिनांक 10 दिसम्बर 2010
की बैठक में विमोचित की गई थी उन्हें उनके पंजीयन उपरांत
संचानालय (कृषि) माध्यम से उपआयुक्त (गुणवत्ता नियंत्रण), कृषि
एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय, शास्त्री भवन, नई दिल्ली
को अधिसूचना हेतु भेजा गया।
iii विश्वविद्यालय द्वारा विमोचित एवं अधिसूचित प्रजातियों का पौध
किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण, भारत सरकार, नई
दिल्ली में दस्तावेजीकरण
विश्वविद्यालय द्वारा विकसित गेंहू की एम.पी. 4010 एवं
आर. व्ही.डबलू 4106, तौरिया एवं सरसों की जवाहर तोरिया 1, जे.एम. 1, जे.एम.
2, जे.एम. 3 एवं जे.एम. 4, बाजरा की जे.बी.व्ही. 2, जे.बी.व्ही. 3 एवं
जे.बी.व्ही. 4, सोयाबीन की जे.एस. 335 एवं आर.व्ही.एस. 2001-4, कपास खण्ड़वा
2, खण्ड़वा 3, जवाहर कपास 4, जवाहर ताप्ती, जे.के. 5, जे.के.एच.वॉय 1,
जे.के.एच.वॉय 3, जे.सी.सी. 1 एवं विक्रम एवं ज्वार की जवाहर ज्वार 741,
जवाहर ज्वार 938, जवाहर ज्वार 1041, जवाहर ज्वार 1022, सी.एस.एस. 18 किस्मों
को अनुसंधान निदेशालय द्वारा दस्तावेजीकरण हेतु पौध किस्म एवं कृषक अधिकार
संरक्षण प्राधिकरण, भारत सरकार, नई दिल्ली में भेजा गया।
iv
बीहड़ अनुसंधान
परियोजना का शुभारंभ
बीहड़ अनुसंधान परियोजना के कार्यक्रम हेतु ग्राम ऐसाह, जनपद पंचायत अम्बाह
जिला मुरैना में 119.28 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण प्राप्त कर अनुसंधान
कार्य प्रारंभ किया जा चुका है।
v
मध्यप्रदेश के नीमच एवं मंदसौर जिलों में भूगर्भ जल एवं लवणीय मृदाओं का
सर्वेक्षण एवं श्रेणीकरण
अखिल भारतीय समन्वित लवणीय मृदाओं का प्रबंध एवं लवणीय जलों का कृषि में
उपयोग परियोजना के अंतर्गत नीमच जिले में 405 भूगर्भ जलों तथा मंदसौर जिले
में लवणीय मृदाओं के नमूने एकत्रित किये गये व उन नमूनों के आधार पर रिमोट
सेंसिंग एवं भोगोलिक पहचान प्रणाली की सहायता से भूगर्भ जल गुणवत्ता एवं
मृदाओं का मानचित्र तैयार किया गया।
vi. अरहर में फॉइटोफ्थोरा
झुलसा के जंगली प्रतिरोध स्त्रोत
अरहर में फॉइटोफ्थोरा झुलसा रोग के प्रतिरोधक स्त्रोत हेतु 4 जंगली
प्रजातियों
Cajanus albicans, Cajanus platycarpus,
Cajanus scaravaeoides and Rhyncosia bracteata का मूल्यांकन किया
गया जिसमें
Cajanus platycarpus इस बीमारी के
प्रति असंक्रमित पाई गयी।
vii.
असिंचित क्षेत्रों हेतु चना आधारित फसल प्रणाली
लगातार तीन वर्ष तक एकीकृत पादप पोषक तत्व प्रबन्धन के साथ असिंचित चना
आधारित फसल प्रणाली के पहचान हेतु किये गये परीक्षण परिणामों से स्पष्ट है
कि सोयाबीन-गेंहूॅ (प्रथम वर्ष)-सोयाबीन-चना (द्वितीय वर्ष) फसल प्रणाली
में 20:17:20:20 के अनुपात में नत्रजन, फास्फोरस, पोटास एवं सल्फर प्रति
हे. के प्रयोग से सर्वाधिक उपज प्राप्त होती है जो कि वर्मीकम्पोस्ट (2 टन
प्रति हे.) + जैव उर्वरक के उपयोग से सार्थक रूप से अधिक पाई गई।
viii.
चना में नये रोगकारक की पहचान
सोयाबीन-चना फसल प्रणाली में नया रोगकारक देखा गया जो चने की फसल को
प्रभावित करता है। इस रोगकारक की पहचान
Colletotricum dematium
के रुप में की गई। यह रोगकारक चने की उकठा अवरोधक प्रजाति जे.जी. 315 की
उपज में 40 से 50 प्रतिशत तक की हानि पहुँचाता है।
ix.चना के उकठा निरोधक नवीन जीन रूपों की पहचान
चना की आई.पी.सी. 2005-79, जे.जी. 923974, आई.सी. 552241, जी.जे.जी. 0920,
आई.पी.सी. 09-160, आई.पी.सी.के. 09-85, फूले 0302-7, जे.जी. 14 और आई.पी.सी.
2006-84 जीनोटाइप्स उकठा रोग के प्रति अवरोधी पाई गईं।
x. बाजरा
की संकर प्रजातियों की उपज का ऑकलन
एकल संकर वाली बाजरा की 48 संकर किस्मों के उपज परीक्षण में चार संकर किस्में
(93222, × डी.पी.आर.-42, 96222
× 11719, 863 × डी.पी.आर -10 और 96222 ×
जी.बी.आई-75) अधिक उपज वाली पाई गईं।
xi. अरहर
में जीवद्रव्य नरबन्धयता एवं रेस्टोरर जीन रूपों की पहचान
अरहर में जीवदृव्य नरबन्धयता आधारित संकर किस्मों के विकास हेतु 20 नये
जीवद्रव्य नरबन्धयता तथा उनके रेस्टोरर जीन रूपों की पहचान की गई। इन जीन
रूपों से अत्यधिक संकर ओज प्राप्त हुआ। उक्त जीन रूपों से जीवद्रव्य
नरबन्धय जी.टी. 33, जी.टी. 288ए. जी.टी. 289ए, आई.सी.पी.ए. 2039,
आई.सी.पी.ए. 2042, आई.सी.पी.ए. 2043, आई.सी.पी.ए. 2046, आई.सी.पी.ए. 2047,
आई.सी.पी.ए. 2048, आई.सी.पी.ए. 2050, आई.सी.पी.ए. 2052, आई.सी.पी.ए. 2078,
आई.सी.पी.ए. 2079, आई.सी.पी.ए. 2086, आई.सी.पी.ए. 2089, आई.सी.पी.ए. 2092,
आई.सी.पी.ए. 2098, जे.पी.ए. 1, जे.पी.ए. 2, जे.पी.ए. 3 एवं रेस्टोरर जीन
रूप आई.सी.पी.आर. 3462, आई.सी.पी.आर. 3464, आई.सी.पी.आर. 2740, आई.सी.पी.आर.
3477, आई.सी.पी.आर. 3491, आई.सी.पी.आर. 3461, आई.सी.पी.आर. 3462,
आई.सी.पी.आर. 3471, आई.सी.पी.आर. 3473, आई.सी.पी.आर. 3341, आई.सी.पी.आर.
3472, आई.सी.पी.आर. 3340, आई.सी.पी.आर. 3359, आई.सी.पी.आर. 3394,
आई.सी.पी.आर. 3497, आई.सी.पी.आर. 3933, आई.सी.पी.आर. 3381, आई.सी.पी.आर.
2438, आई.सी.पी.आर. 3337, आई.सी.पी.आर. 2751 संरक्षित किये जा रहे हैं।
xii.
अरहर की नवीन संकर प्रजातियों की पहचान
अरहर की नवीन जीव द्रव्य नरबध्यता वाली संकर किस्मों के परीक्षण प्रयोग में
35.2 प्रतिशत का सर्वाधिक संकर ओज एक संकर आई.सी.पी.एच. 3461 से प्राप्त
हुआ। आई.सी.पी.एच. 3494 एवं आई.सी.पी.एच. 3491 उपज में क्रमश: दूसरे एवं
तीसरे स्थान पर थे।
xiii.
सोयाबीन में कीट नियंत्रण हेतु नये कीटनाशी की पहचान
सोयाबीन में इल्ली तथा सेमीलूपर जैसे कीटों से अत्यधिक उपज हानि होती है
इनके नियंत्रण हेतु नये कीटनाशी मेटाफ्लूमीजोन 22 प्रतिशत एस.सी. तथा
फ्लूबेन्डामाइड 48 एस.सी. 600 मि.ली./हे. प्रभावी पाये गये।
xiv.
सोयाबीन की उच्च ग्रंथि उत्पादक जीनोटाइप्स
सोयाबीन की 60 जीनोटाइप्स का परीक्षण ग्रंथि उत्पादन योग्यता जानने के लिए
किया गया। जिनमें से जीनोटाइप 2006-54 तथा जे.एस. 97-52 में सर्वाधिक
ग्रन्थियँा (49 प्रति पौधा) एवं उच्च ग्रंथि शुष्क भार (310 मि.ग्रा./पौधा)
क्रमश: पाई गई।
xv.
ग्रीष्मकालीन धनियॉ पत्ती उत्पादन लाभकारी
सामान्यत: गर्मी में फसलों का उत्पादन कम किया जाता है और खाली पड़े रहते
हैं इसलिए धार जिले में ग्रीष्मकालीन धनियॉ पत्ती का उत्पादन तीन कृषक
प्रक्षेत्रों पर कराया गया। जहां औसतन 96 क्वि./हे. उपज प्राप्त हुई और
रूपये 200,000/- की शुध्द आय भी कम समय में प्रति हे. प्राप्त हुई। अत:
ग्रीष्मकालीन धनियॉ उत्पादन अत्यधिक लाभकारी है।
बीज उत्पादन कार्यक्रम
विश्वविद्यालय के प्रक्षेत्र निदेशालय द्वारा खरीफ 2011
में सोयाबीन का 3607.07 क्विं., मूंग का 27.4 क्विं., उर्द का 35.0 क्विं.,
धान का 900 क्विं., बाजरा का 0.75 क्विं., मूंगफली का 8.0 क्विं., मक्का का
19.10 क्विं. एवं ज्वार का 3.0 क्विं. (कुल 4600.95 क्विं.) प्रजनक बीज
उत्पादित किया गया।
रबी 2011-12 में चना का 4500 क्विं., गेंहू का 6340 क्विं., मसूर 16 क्विं.,
मटर 22.50 क्विं., सरसों 140.40 क्विं., तौरिया 2.00 क्विं., बरसीम 40 क्विं.
एवं जई 140 क्विं. (कुल 11216.0 क्विं.) बीज उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित
किया गया है।
बीज उत्पादन किस्में
Nucleus
seed
Gram
JG 11, JG16, JG 130, JAKI 9218, JG 6, and JKG 3
Wheat
MP 12 03, MP 4010, Lok 1, GW 366, GW 322 and Sujata
Pea
Arkel and AP 3
Lentil
JL 3
Mustard
JM 3, JM 4 and Rohini
Breeder Seed
Gram
JG 11, JG16, JG 130, JAKI 9218, JG 12, JG 6, and JKG 3
उपमहानिदेशक (उद्यान), भारतीय कृषि
अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली का भ्रमण
डॉ. एच.पी. सिंह, उपमहानिदेशक
(उद्यान), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा
अगस्त 20-22, 2011 को विश्वविद्यालय के क्षेत्राधिकार में आने
वाले कृषि एवं उद्यानिकी महाविद्यालय, इन्दौर एवं मंदसौर का
भ्रमण किया गया। भ्रमण के दौरान डॉ. सिंह द्वारा क्षेत्र में
उद्यानिकी का जायजा लिया गया व भविष्य में उद्यानिकी फसल की
संभावनाओं पर विचार विमर्श किया गया।
संगोष्ठी, प्रशिक्षण एवं बैठक
बीज उत्पादन कार्यक्रम 2010-11 की समीक्षा एवं खरीफ
2011 की कार्ययोजना में विभिन्न फसलों के नाभकीय तथा
प्रजनक बीज उत्पादन कार्यक्रम के निर्धारण हेतु दिनांक 02
मई 2011
दिनांक 16-17 अगस्त 2011 को पंचवर्षीय समीक्षा
समिति (दलहन) की बैठक
जापान इन्टरनेशनल कॉरपोरेशन एजेन्सी के सहयोग से
संचालित म.प्र. में सोयाबीन उत्पादन को बढ़ाने की परियोजना
की प्रथम बैठक मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल में सितम्बर
01-02, 2011 को
मध्यप्रदेश जल क्षेत्र पुनर्निर्माण परियोजना के
अंतर्गत सम्पन्न कार्यक्रम की समीक्षा एवं रबी 2011-12
कार्यक्रम में निर्धारण हेतु बैठक दिनांक नवम्बर 21, 2011
मध्यप्रदेश जल क्षेत्र पुनर्निर्माण परियोजना के
अंतर्गत पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम दिनांक 12 से 16
दिसम्बर 2011
विश्वविद्यालय के सभागार में दिनांक जनवरी 31 फरवरी
2012 को संकर बीज उत्पादन तकनीक विषय पर प्रशिक्षण
कार्यक्रम
मध्यप्रदेश जल क्षेत्र पुनर्निर्माण परियोजना के
अंतर्गत दिनांक 02.01.2012 को कृषक संगोष्ठी का आयोजन कृषि
विज्ञान केन्द्र, उज्जैन में ।
पुरुस्कार
विश्वविद्यालय के ऍंाचलिक अनुसंधान
केन्द्र, खरगौन को जिले के श्रेष्ठ जैव विविधता उद्यान
हेतु जैवविविधता एवं जैवप्रोद्यौगिकी विभाग,
मध्यप्रदेश शासन, भोपाल द्वारा दिनांक 10.05.2011 को
पुरस्कृत किया गया।
डॉ. बी. मीनाकुमारी,
उपमहानिदेशक (मत्स्य), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्,
नई दिल्ली द्वारा विश्वविद्यालय में क्रियान्वित
राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना के अंतर्गत कृषि
विज्ञान केन्द्र, झाबुआ द्वारा स्थापित कड़कनाथ मुर्गी
पालन समूह, झायड़ा को कड़कनाथ पालन पर उत्कृष्ट कार्य
करने हेतु दिनांक जून 19, 2011 को पुरुस्कृत किया गया।
स्वतंत्रता दिवस 2011 समारोह के
अवसर पर झाबुआ जिला प्रषासन द्वारा विश्वविद्यालय में
क्रियान्वित राष्ट्रीय कृषि नवाचार परियोजना के
अंतर्गत कृषि विज्ञान केन्द्र, झाबुआ द्वारा स्थापित
संतोषी कृषक महिला समूह को जैविक खेती अपनाने व उसको
प्रोत्साहित करने हेतु पुरुस्कृत किया गया।
गणतंत्रत दिवस 2012 समारोह के अवसर
पर श्री रमेश पुत्र श्री मान सिंह ग्राम बागलावार जिला
झाबुआ को राष्ट्रीय नवाचार परियोजना के अंर्तगत
उत्कृष्ट कृषि कार्य हेतु रुपये 10,000/- का नगद
पुरुस्कार जिला प्रशासन, झाबुआ द्वारा प्रदान किया गया।
चना की नई
विकसित किस्मों को राष्ट्रीय पहचान
बैंगलौर में अगस्त 20-22, 2011 को
आयोजित चना की अखिल भारतीय वार्षिक कार्यशाला में चना
अनुसंधान परियोजना, कृषि महाविद्यालय, सीहोर द्वारा विकसित
चने की दो नवीन किस्मों आर.व्ही.सी. 202 तथा आर.व्ही.सी.
203 को देश के मध्यक्षेत्र में देर से बुवाई हेतु पहचान
किया गया। जिसका पंजीयन राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन
ब्यूरो, पूसा कैम्पस, नई दिल्ली द्वारा कराया गया और
राष्ट्रीय पहचान संख्या क्रमश:
IC590133 एवं
IC590134 पत्र
क्रमांक जी.सी.डी. दिनांक 01.11.2011 के द्वारा प्राप्त
हुआ।
3. प्रसार शिक्षा/कृषि
विज्ञान केन्द्र
मध्य प्रदेश शासन द्वारा ग्वालियर में
द्वितीय कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना ग्वालियर कृषि
विश्वविद्यालय अध्यादेश 2008 के प्रस्थापना द्वारा की गई ।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विष्वविद्यालय के
कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत चार कृषि महाविद्यालय (ग्वालियर,
सीहोर, खण्डवा एवं इंदौर), एक उद्यानिकी महाविद्यालय (मंदसौर),
पाँच आंचलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र (मुरैना, खरगोन, झाबुआ,
सीहोर एवं इंदौर), चार क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र (उज्जैन,
ग्वालियर, मंदसौर एवं खण्डवा), एक कृषि अनुसंधान केन्द्र,
बागवई (ग्वालियर), एक फल अनुसंधान केन्द्र ईंटखेड़ी (भोपाल),
एक उद्यानिकी अनुसंधान केन्द्र, जॉवरा (रतलाम), एक लवणीय
प्रभावित मृदा कृषि अनुसंधान केन्द्र, बड़वाह (खरगौन) एवं
19 कृषि विज्ञान केन्द्र हैं जो प्रदेश के 25 जिलों के छ:
कृषि जलवायु अंचलों (गिर्द, मालवा पठार, निमाड़ घाटी,
विंध्या पठार, झाबुआ पहाड़ी तथा बुंदेलखण्ड) में फैले हुए
हैं।
अ- कृषि विज्ञान
केन्द्रों द्वारा संचालित गतिविधियाँ
1- प्रक्षेत्र परीक्षण (On
Farm Testing) :- कृषकों के प्रक्षेत्र पर वर्ष
2011-12 में अब तक 155 नवीन तकनीक का परीक्षण किया गया है।
जिसका विस्तृत वर्णन नीचे तालिका क्र. 1 में दिया गया है।
तालिका क्र. 1 :
क्र.
विषय क्षेत्र
कृषक
प्रक्षेत्र परीक्षण 2011-12
1.
किस्मों का मूल्यांकन
23
2.
एकीकृत कीट-व्याधि प्रबंधन
19
3.
एकीकृत बीमारी प्रबंधन
12
4.
एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन
31
5.
एकीकृत फसल प्रबंधन
11
6.
नर्सरी प्रबंधन
01
7.
कार्यभार प्रंबधन
05
8.
आय अर्जन
09
9.
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन
10
10.
खरपतवार प्रबंधन
12
11.
उन्नत कृषि यंत्र
10
12.
पशुपालन
06
13.
स्वंय सहायता समूह
04
14.
मछली पालन
02
कुल योग
155
2- अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन
(Front Line Demonstration) :- कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा
दलहन, तिलहन के अलावा अन्य फसलों पर अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन के माध्यम से अनुसंसित तकनीक का प्रदर्शन किया गया है। जिसका
वर्णन नीचे की तालिका क्र. 2 में दिया गया है।
तालिका क्र. 2 :
क्र.
अंग्रिम पक्ति प्रदर्शन
2011-12
क्षेत्रफल (हे.)
लाभार्थियों की संख्या
1
तिलहन
101.60
250
2
दलहन
132.60
333
3
दलहन एवं तिलहन के अलावा
(खाद्यान्न)
324.88
1046
4
उद्यम
23
125
कुल योग
582.08
1754
3- प्रशिक्षण (Training)
:- कृषि विज्ञान केन्द्र का प्रमुख महत्वपूर्ण कार्य किसानों को
प्रशिक्षण देना है। लम्बी अवधि के व्यावसायिक दक्षतायुक्त प्रशिक्षण किसानों,
कृषक महिलाओं, ग्रामीण युवाओं एवं स्कूली बच्चों के लिए आयोजित किये जाते
है जिससे वह कृषि की उन्नत तकनीक अपनाने तथा अपनी खेती से आय बढाने की ओर
अग्रसर हो। यह प्रशिक्षण विभिन्न विषयों के अन्तर्गत जगह विशेष की जरूरत के
हिसाब से आयोजित किये जाते है।
अन्य विस्तार गतिविधियाँ :- प्रक्षेत्र
परीक्षण, अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन तथा प्रशिक्षण के अलावा कृषि विज्ञान
केन्द्रों द्वारा अन्य कृषकों के नवीनतम तकनीक को सीधे किसानो तथा कृषि
विस्तार में संलग्न अधिकारियों तक पहुँचाने के लिये कृषि विज्ञान केन्द्र
द्वारा किसान मेला, कृषक संगोष्टी, प्रक्षेत्र दिवस आदि गतिविधियाँ भी
संचालित की जाती है।
4- कृषि विज्ञान केन्द्र न्यूज लेटर :-
विश्वविद्यालय के अधीन कार्यरत् 19 कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा अपने-अपनें
केन्द्रों से त्रेमासिक न्यूज लेटर (1000-1500 प्रतियाँ) प्रकाशित कर जिले
के प्रत्येक ग्राम पंचायत तक नि:शुल्क भेजी जा रही है जिनें पिछले महीनों
में दिये गये अनुसंधानों का परिणाम तथा अगामी तीन महीनों का कृषि कार्यक्रम
प्रकाशित कर उपलब्ध किया जा रहा है।
5- किसान मोबाइल संदेश (के.एम.एस.) :- समस्त
कृषि विज्ञान केन्द्रों द्वारा प्रत्येक जिले मे 1000 जागरुक कृषकों के
साथ-साथ कृषि विस्तार अधिकारी एवं बीज विक्रेताओं को प्रत्येक सप्ताह में
दो बार आगामी सप्ताह में कृषि में की जाने वाली गतिविधयाँ एवं कीट व्याधि
रोकने के उपाय हेतु उन्नत तकनीक की जानकारी उपलब्ध मोबाइल पर एस.एम.एस. के
माध्यम से सतत भेजी जा रही है जिसके परिणाम काफी संतोषजनक पाये गये है।
ब- विस्तार निदेशालय द्वारा
प्रकाशन :- कृषि विज्ञान केन्द्रो के अलावा विस्तार निदेशालय
स्तर से किसानो और कृषि विस्तार में संलग्न अधिकारियों एवं विश्व विद्यालय
में अध्ययनरत् विद्यार्थियों तक विश्वविद्यालय द्वारा ईजात की गई नवीन
तकनीक सीधे पहुँचाने के उद्देश्य से त्रेमासिक कृषि विजय पत्रिका, वार्षिक
केलेण्डर, विश्वविद्यालय न्यूज लेटर आदि का सतत प्रकाशन कर उपलब्ध कराया जा
रहा है।
4. लेखा
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर को आंतरिक
स्रोतों से प्राप्त राशि को जोड़कर वर्ष 2011-12 का प्रारंभिक शेष 127.99
लाख से प्रारंभ हुआ था। राज्य शासन द्वारा चालू वित्त वर्ष में समय पर
अनुदान उपलब्ध कराने के कारण विश्वविद्यालय की आर्थिक स्थिति सामान्यत:
संतोषप्रद है। शासन द्वारा वर्ष 2011-12 के माह दिसम्बर 2011 तक
निम्नानुसार अनुदान उपलब्ध कराया गया है -
(राशि लाखों में)
सं.क्र.
मद
प्रस्तावित राशि
वर्ष 2011-12 दिसम्बर 2011 तक प्राप्त राशि
1.
कृषि आयोजना
890.00
667.50
2.
कृषि आयोजनेत्तर
1900.00
1425.00
3.
आदिवासी उप-योजना (अधोसंरचना)
87.00
65.25
4.
आदिवासी उप-योजना (संधारण अनुदान)
313.00
234.75
5.
विशेष घटक योजना (अधोसंरचना)
130.00
97.50
6.
विशेष घटक योजना (संधारण अनुदान)
230.00
172.50
कुल योग
3550.00
2662.50
इस विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले
समस्त महाविद्यालयों/इकाईयों को समस्त राशि उपलब्ध कराई जा रही है।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर को अधीन
महाविद्यालयों/ इकाईयों के कर्मचारियों, अधिकारियों को स्ववित्तीय पेंशन,
सी.पी.एफ. अवकाश नगदीकरण आदि भुगतान की जा रही है।
विश्वविद्यालय के विभिन्न स्त्रोतों से मिलने वाली राशि के अतिरिक्त
विश्वविद्यालय के अधीन संचालित कृषि प्रक्षेत्रों की अधोसंरचना विकसित कर
तथा परामर्श एवं मूल्यांकन प्रक्रिया आदि के द्वारा आंतरिक स्त्रोतों से आय
में वृध्दि के प्रयास किये जा रहे हैं।
म.प्र. राज्य शासन के आदेश क्रमांक/बी-4/11/2009/14-2 दिनांक 12.09.2008 के
द्वारा राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर की सथ्पाना
हेतु अधोसंरचना विकास के लिये राशि 54.69 करोड़ की स्वीकृति दी गई है।